भारतीय बैंको में हैसियत के अनुसार दो तरह से कर्ज मिलता है एक मरने के लिए दूसरा अरबपति बनने के लिए।

गंजबासौदा// (सुरेंद्रसिंह रघुवंशी) बैंक कर्ज किसान की मौत का कारण बनता जा रहा है जबकि यह उद्योगपतियों के लिए एक व्यापार या कहें लाभ का सौदा है आइये जानते हैं कैसे देश में दो तरह के कर्ज होते हैं –एक वह कर्ज जिसे लेने के बाद लौटने का कभी मन करे,मन करे तो लौटा दीजिये नहीं मन करे तो मन की बात करते हुये विदेश चले जाईये जैसे-विजय माल्या , नीरव मोदी इत्यादी। और आप बड़े आराम से कह सकते हैं की नहीं लौटायेंगे।
- दूसरा कर्ज वह होता है की कर्ज लेने के बाद अगर नहीं लौटाया तो आप इस धरती से ही लौट जाईये या आपसे किसी भी तरह से वसूल लिया जाएगा जैसे- किसान कर्ज। यदि आपकी फसल खराब हो गयी है तो आप जमीन बेचकर लौटाईये नहीं तो आप खुद ही आत्महत्या कर लीजिये नहीं तो बैंक वाले ही आपसे वसूल लेंगें। किसानों के पास विदेश जाने या भागने के पैसे तो होते नहीं है और न हीं वो इतना कर्ज ले सकते हैं जिस तरह बड़े घराने या व्यापारी लेते है।

आंकड़े क्या कहते हैं

वित्त मंत्रालय के आकड़ों पर ध्यान दे तो समझ में आता है की ललित मोदी, विजय माल्या तथा नीरव मोदी तो केवल बड़े – बड़े कर्जदारों का एक छोटा सा चेहरा है | वित्त मंत्री के आकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2017 तक कुल 1,762 डिफाल्टरों के ऊपर केवल भारतीय स्टेट बैंक का 25,104 करोड़ रूपये बकाया है वहीँ सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंक का केवल 8,915 डिफाल्टरों पर 92,376 करोड़ रूपये बकाया है |

डिफाल्टर का मतलब

डिफाल्टर का मतलब यह होता है की जो पैसा बैंक से लिया गया है और तय समय या किश्त को निश्चित समय पर लम्बे समय तक नहीं चुकाया जाता है तो इस तरह के कर्जदार को डिफाल्टर कहते हैं । इसका मतलब यह होता है की बैंक तथा सरकार इस कर्ज को वसूलने में सक्षम नहीं है | जितना पैसा 8,915 व्यक्तियों पर है *उसका आधा से भी कम लगभग 40% पैसा ही मध्यप्रदेश के सभी किसानों पर है। उसके बाद भी मध्य प्रदेश के किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं भारत में किसान आत्महत्या के मामले में चौथा स्थान रखता है, इसके उलट किसी बड़े डिफाल्टर को आपने आत्महत्या करते नहीं सुना होगा।

ताजा आकड़ों के अनुसार सितम्बर 2017 से फ़रवरी 2018 तक सिर्फ 38 बड़े घराने को 516 करोड़ रूपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया गया है अर्थात् बैंकों ने इन खातों के संदर्भ में अपनी कमाई में से 100 प्रतिशत का प्रावधान कर दिया है |
यह खाता धारक वो लोग हैं जो जानबूझकर क़र्ज़ नहीं लौटाने वाली इकाई कहा जाता है जिन्होंने लिए गए क़र्ज़ को उसके घोषित उद्देश्यों में प्रयोग नहीं किया है। क्षमता होते हुए भी क़र्ज़ चुकाया न हो या धन का गबन कर दिया हो या फिर गिरवी रखी सम्पत्ति को बैंक की जानकारी के बगैर निस्तारित कर दिया हो। वित्त मंत्री के आकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2017 तक भारतीय स्टेट बैंक का जान-बूझकर क़र्ज़ नहीं लौटाने वाले कुल 1,762 डिफाल्टरों के ऊपर 25,104 करोड़ रुपये बकाया है, दूसरे स्थान पर पंजाब नेशनल बैंक है जिसका 1,120 डिफाल्टरों पर 12,278 करोड़ रुपये बकाया है तथा कुल मिलाकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का 8,915 डिफाल्टरों पर 92,376 करोड़ रुपये बकाया है।

सरकार क्या कहती है ?

इस साल जनवरी में केंद्र की मोदी सरकार ने लोकसभा में कहा था कि देश के वाणिज्यिक बैंकों ने पिछले  पांच वर्षों की अवधि में 2,30,287 करोड़ रूपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया यानी बैंकों ने अब इस राशि को वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी है। यह रकम इतना होती है की मध्यप्रदेश का एक वर्ष का कुल बजट नहीं है। जितना की कुछ बड़े घराने कर्ज लेकर बैठ गये है। इसमें अकेले भारतीय स्टेट बैंक ने 20,339 करोड़ रूपये बट्टे खाते में डाल दिया था।

इसमें यह बात जानना जरुरी होगा की कब कितना रुपया बैंकों ने बट्टे खाते में डाला है। वर्ष 2012 – 13 में सरकारी बैंको का कुल बट्टा खाता 27,231 करोड़ रूपये था तथा वर्ष 2013 – 14 में सरकारी बैंकों ने 34,409 करोड़ रूपये के फसे कर्ज को बट्टे खाते में डाला था।

बट्टे खाते में डाली गई राशि और किसान

वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के सरकार बनने के बाद यह राशी तीन गुना बढ़ गयी है | वर्ष 2014 – 15 में यह राशी 49,018 करोड़, 2015 – 16 में 57,585 करोड़ और मार्च 2017 में समाप्त हुये वित्त वर्ष में 81,683 करोड़ रूपये तक पहुँच गयी। लोकसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री ने रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया के आकड़ों का हवाला देते हुये कहा है की वित्त वर्ष 2017 – 18 की पहली छ:माही में सार्वजनिक बैंक द्वारा 53,625 करोड़ रूपये की राशी को बट्टे खाते में डाली  गयी है ।
अगर सरकार उधोगपतियों के छ: महीने का जो कर्ज माफ़ किया है उसका 70% ही केवल किसानों का माफ़ कर देता तो अकेले मध्य प्रदेश के ही सभी किसानों पर से पिछले 12 वर्षों का सभी तरह का कर पूरी तरह से खत्म हो गया होता। लेकिन सरकार कृषि कर्ज माफ़ करने के बजाये किसानों पर गोली चलती है।

ऐसा नहीं है की सरकारी बैंक में से केवल भारतीय स्टेट बैंक ने ही उद्ध्योगपति का कर्ज माफ़ किया है बल्कि सभी बैंकों ने भारतीय स्टेट बैंक का ही अनुसरण किया है यह आकड़ा इस प्रकार है । स्टेट बैंक के अलावा पंजाब नेशनल बैंक ने भी 2016-17 में 9,205 करोड़ रुपये बट्टे खाते डाले हैं. इसके बाद बैंक ऑफ इंडिया ने 7,346 करोड़ रुपये, केनरा बैंक ने 5,545 करोड़ रुपये और बैंक ऑफ बड़ौदा ने 4,348 करोड़ रुपये बट्टे खाते डाले हैं।