नियति प्रम के निरंतर उल्लंघन से प्रकृति का अदृश्य वातावरण भी इन दिनों कम दूषित नहीं हो रहा है। भूकम्प, तूफान, बाढ़, विद्रोह, अपराध, महामारियां आदि पर नियंत्रण पाना कैसे संभव होगा, समझ नहीं आता। किंकर्त्तव्यविमूढ़ स्थिति में पहुंचा हतप्रभ व्यक्ति प्रमश: अधिक निराश होता है। इतना साहस और पराक्रम तो विरलों में होता है, जो आंधी, तूफानों के बीच भी आशा का दीपक जलाए रह सकें, गतिशीलता में कमी न आने दें। ऐसे व्यक्तियों को महामानव-देवदूत कहा जाता है पर वे यदाकदा ही प्रकट होते हैं। आज जनसाधारण का मानस ऐसे ही दलदल में फंसा है। होना तो चाहिए था कि अनौचित्य के स्थान पर औचित्य को प्रतिष्ठत करने के लिए साहसिक पुरुषार्थ जगता पर लोक मानस में उस स्तर का उच्च स्तरीय उत्साह नहीं उभर रहा है।   
इन परिस्थितियों में साधारण जनमानस का निराश होना स्वाभाविक है। समझ लेना चाहिए कि निराशा हल्के दर्जे की बीमारी नहीं है, वह जहां भी जड़ जमाती है, घुन की तरह मजबूत शहतीर को भी खोखला करती जाती है। निराशा अपने साथ हार जैसे मान्यता संजोए रहती है। इतने दबावों से दबा आदमी स्वयं तो टूटता ही है, साथियों को भी तोड़ता है। इससे शक्ति का अपहरण होता है, जीवनी शक्ति जबाव दे जाती है, तनाव बढ़ते जाने से उद्विग्नता बनी रहती है और ऐसे रचनात्मक उपाय नहीं दिखते, जिनके सहारे तेज बहाव वाली नाव खेकर पार पाया जाता है। निराश व्यक्ति जीत की संभावना नकारने के कारण जीती बाजी हारते हैं। निराशा न किसी गिरे को ऊंचा उठने देती है और न प्रगति की किसी योजना को प्रियान्वित होने देती है। अस्तु, निराशा को छोटी बात न मानकर उसके निराकरण का हर क्षेत्र में प्रयत्न होता रहे। जहां भी निराशा का माहौल हो, उसके निराकरण का हर संभव उपाय करना चाहिए। इसका उपचार यही है कि प्रतिरोध में समर्थ चिंतन और पुरुषार्थ के लिए जन-जन की विचारशक्ति को उत्तेजित किया जाए। उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं पर ध्यान देने और उन्हें समर्थ बनाने के लिए जिस मनोवृत्ति को उत्साहपूर्ण प्रश्रय मिलना चाहिए, उसके लिए आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार की जाए।