नई दिल्ली : देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट आईपीसी की धारा 377 (समलैंगिकता) की संवैधानिक वैधता पर गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया है. प्रधान न्यायधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली संवैधानिक पीठ ने दो बालिगों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को आपराध मानने वाली धारा 377 को सिरे से खारिज कर दिया है. कोर्ट ने धारा 377 को मनमाना करार देते हुए व्यक्तिगत पसंद को सम्मान देने की बात कही है.

इसी साल जुलाई में हुई थी सुनवाई
इसी साल जुलाई महीने में 377 पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. आईपीसी की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर महज 4 दिन ही सुनवाई चली थी. पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई कानून मौलिक अधिकारों का हनन करता है तो कोर्ट इस बात का इंतज़ार नहीं करेगा कि सरकार उसे रद्द करें.

केंद्र सरकार ने अपना रुख नहीं किया साफ
जुलाई में हुई इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के विवेक पर इस बात को छोड़ते हैं कि वह खुद तय करे कि धारा-377 के तहत दो बालिगों के बीच बनें समलैंगिक संबंध को अपराध मानें या नहीं. 

सुप्रीम कोर्ट ने बदला था दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला
गौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई में 2 जुलाई 2009 को दो बालिगों में सहमति से अप्राकृतिक संबंध को अपराध नहीं माना था यानि कि इसे 377 IPC की धारा से बाहर कर दिया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने 11 दिसंबर 2013 को हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए इसे अपराध ही ठहराया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुनर्विचार याचिका को भी खारिज करते हुए अपराध ही माना, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कयूरेटिव पेटिशन दायर की गई थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस याचिका को पांच जज सुनेगें और फिर फैसला सुनाएंगे.

क्या कहती है धारा 377?
भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में अप्राकृतिक अपराध का जिक्र है. इस धारा में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि जो भी प्रकृति के नियम के विरुद्ध किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ यौनाचार करता है, उसे उम्रकैद या दस साल तक की कैद और जुर्माना देने का प्रावधान है. बता दें कि इस धारा के तहत जमानत न मिलने का प्रावधान है.